पुस्तक समीक्षा | ऑपरेशन सिंदूर और भारत की राष्ट्रीय चेतना
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Dr. Garima KumawatSenior Fellow
Centre for Joint Warfare Studies, HQ Integrated Defence Staff, Ministry of Defence
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सारांश
डॉ. मीना रानी - ऑपरेशन सिंदूर और भारत की राष्ट्रीय चेतना, विकास प्रकाशन, बीकानेर, 2025, pp.169, INR 500, ISBN-13: 9788199216594.
भारत के समसामयिक रणनीतिक इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो न केवल सैन्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होती हैं, बल्कि एक राष्ट्र की आत्मचेतना को भी नई परिभाषा देती हैं। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए नृशंस आतंकी हमले के उत्तर में भारत द्वारा संचालित 'ऑपरेशन सिंदूर' ऐसी ही एक ऐतिहासिक परिघटना है। डॉ. मीना रानी द्वारा सम्पादित ऑपरेशन सिंदूर और भारत की राष्ट्रीय चेतना - उस घटनाक्रम को केवल एक सैन्य अभियान के रूप में नहीं, बल्कि भारत की बहुआयामी राष्ट्रीय चेतना की गहन अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
डॉ. मीना रेखांकित करती हैं कि पिछले एक दशक में भारत ने वैश्विक मंच पर जो विशिष्ट पहचान बनाई है, वह केवल आर्थिक या तकनीकी उन्नति की कथा नहीं है — यह भारत की आत्मचेतना, नीतिगत स्पष्टता और नेतृत्व-नैतिकता के सामूहिक उत्कर्ष की परिणति है। एक ओर विश्व ने भारत को 'नवोदित शक्ति' के रूप में देखा, वहीं भारत ने स्वयं को 'संतुलित शक्ति' के रूप में स्थापित किया।
इस संकलन में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से ऑपरेशन सिंदूर की परतों को उद्घाटित किया है। डॉ. लाधू राम चौधरी इस विमर्श की वैश्विक पृष्ठभूमि तैयार करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर ने महाशक्तियों की आतंकवाद-विरोधी नीतियों में व्याप्त दोहरेपन को उजागर कर दिया। अमेरिका और चीन जैसे देश, जो सार्वजनिक रूप से आतंकवाद की निन्दा करते हैं, उन्होंने भारत की निर्णायक कार्रवाई पर या तो चुप्पी साध ली या शंकालु स्वर में प्रतिक्रिया दी। वैश्विक कूटनीति के इस अन्धकारमय पक्ष के विपरीत भारत की नीति स्थिर, स्पष्ट और सिद्धान्त-संगत रही — आतंकवाद का कोई धर्म नहीं, कोई पक्ष नहीं और कोई औचित्य नहीं होता।
इसी क्रम में डॉ. विकाश कुमार और डॉ. यश कुमार ने भारत की आतंकवाद-निरोधी कूटनीति को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा है। वे दर्शाते हैं कि यह नीति समय के साथ एक परिपक्व और बहुआयामी संरचना में परिवर्तित हुई है जिसमें सैन्य उत्तरों के साथ-साथ वैश्विक कूटनीति, बहुपक्षीय संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी और विधिक सहयोग तन्त्र भी शामिल हैं। ऑपरेशन सिंदूर इस रणनीति का सबसे समन्वित उदाहरण बना — सीमा पार सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र, एफएटीएफ और जी-20 जैसे मंचों पर राजनीतिक दबाव, सिन्धु जल समझौते के प्रावधानों का पुनरावलोकन और द्विपक्षीय कूटनीतिक सन्धियों का पुनर्समायोजन एक साथ जोड़े गए।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से डॉ. एकता मीणा ने इस अभियान को सम्पूर्ण शासन-तन्त्र की सजगता के परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया है। थल, वायु और नौसेना के समन्वित अभियान के साथ-साथ नागरिक सुरक्षा मॉक ड्रिल, सीमावर्ती राज्यों में प्रशासनिक नियन्त्रण और मीडिया तथा विदेश नीति प्रबन्धन का विस्तृत विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि संकट की घड़ी में खुफिया एजेन्सियों, गृह मन्त्रालय, स्थानीय प्रशासन और आम नागरिकों के बीच संतुलित तालमेल ही सशक्त राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की कुन्जी है।
इस संकलन की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह साइबर स्पेस की उस अदृश्य युद्धभूमि को भी उद्घाटित करता है जो सामान्यतः रडार से बाहर रह जाती है। डॉ. कनिका पंवार का विश्लेषण दर्शाता है कि ऑपरेशन सिंदूर केवल मिसाइलों और ड्रोन तक सीमित नहीं था — वह सोशल मीडिया, सूचना नियन्त्रण, साइबर निगरानी और डिजिटल कूटनीति के माध्यम से लड़ा गया एक आधुनिक युद्ध भी था। भारत ने अपने साइबर आर्किटेक्चर को मजबूत करते हुए न केवल हमलों का जवाब दिया, बल्कि वैश्विक डिजिटल विमर्श में नैतिक वैधता के साथ अपनी भूमिका भी स्पष्ट की।
आत्मनिर्भरता के आयाम को डॉ. सुरभि गुप्ता ने बड़ी सटीकता से विश्लेषित किया है। उनके अनुसार यह अभियान केवल एक ताक्षणिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि दीर्घकालिक रक्षा नीति की परिणति था — एक ऐसी नीति जो आयात-निर्भरता से बाहर निकलकर स्वदेशी तकनीकों, घरेलू प्रणालियों और देशज नवाचारों पर आधारित है। एकीकृत एयर डिफेन्स नेटवर्क, स्वदेशी ड्रोन रोधी प्रणालियाँ और डिजिटल नियन्त्रण केन्द्र इस बात के प्रमाण हैं कि भारत की सामरिक सोच में अब संयम की जगह निर्णय ने, प्रतीक्षा की जगह पहल ने और रक्षा की जगह सक्रिय प्रतिकार ने ले ली है।
बाह्य गठजोड़ों का सामना करने में भारत की सक्षमता को डॉ. प्रताप सिंह ने तुर्की-पाकिस्तान सहयोग के सन्दर्भ में परखा है। तुर्की ने पाकिस्तान को न केवल ड्रोन और प्रशिक्षित ऑपरेटरों के रूप में सैन्य समर्थन दिया, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक सहायता भी प्रदान की। भारत की प्रतिक्रिया इस बार केवल सैन्य नहीं थी — तुर्की कम्पनियों को भारतीय बाजार से बाहर करना, वैश्विक मंचों पर उसकी आलोचना करना और जनमत को अनुकूल दिशा में मोड़ना — ये सब कदम भारत की परिपक्व और दीर्घदृष्टि-युक्त कूटनीतिक परिपक्वता के प्रमाण हैं।
सैन्य संचालन की गहराई में जाकर प्रकाश जांगिड़ भारतीय सेनाओं के त्रि-आयामी समन्वय को रेखांकित करते हैं। राफेल और मिराज 2000 विमानों द्वारा लक्ष्यों पर सटीक प्रहार, ड्रोन घुसपैठ पर थलसेना की मुस्तैदी और अरब सागर में नौसेना की सामरिक तैनाती ने मिलकर एक नेटवर्क-सक्षम युद्ध प्रणाली की आधारशिला रखी। नौसैनिक आयाम पर मनीष कुमार सिंह आईएनएस विक्रान्त के नेतृत्व में जहाजों की तैनाती, ब्रह्मोस मिसाइलों की त्वरित सक्रियता और मिग-29 जेट विमानों की उड़ान को भारत की समुद्री रणनीति के नए मानदण्ड के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह अभियान 1971 की तुलना में तकनीकी और सामरिक दोनों दृष्टियों से कहीं अधिक गहराई लिए हुए था। वही प्रसन्न कुमार शुक्ला इस अभियान को दार्शनिक और ऐतिहासिक दृष्टि से व्याख्यायित करता है। चाणक्य और सुन त्ज़ु के सिद्धान्तों को आधुनिक सैन्य रणनीति के सन्दर्भ में प्रस्तुत करते है।
समग्र रूप में यह सम्पादित संकलन न केवल ऑपरेशन सिंदूर की ऐतिहासिकता और रणनीतिक जटिलताओं की विवेचना करता है, बल्कि भारत की उस उभरती राष्ट्रीय चेतना को भी तार्किक रूप में प्रस्तुत करता है जो युद्ध, कूटनीति, तकनीक, समाज और संस्कृति के गहरे अन्तर्सम्बन्ध में प्रकट होती है। यह पुस्तक शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, विद्यार्थियों, प्रशासकों और जागरूक नागरिकों सभी के लिए अनिवार्य है — क्योंकि भारत की यह यात्रा न तो सहज थी और न आकस्मिक, इसकी जड़ें इतिहास, संस्कृति और समकालीन निर्णयों की पगडण्डियों में गहराई तक समाहित हैं।
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